

चर्च संपत्तियों पर न्यायपालिका का ऐतिहासिक शिकंजा: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा संदेश—‘विलय से नहीं बदलता मालिकाना हक’, फर्जी दस्तावेजों पर सख्ती; सहारनपुर में भी चर्च जमीनों की बिक्री के आरोपों से बढ़ी हलचल
देशभर में धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाओं, विशेषकर चर्च संपत्तियों पर अवैध कब्जे, फर्जी दस्तावेजों के जरिए बिक्री और ट्रांसफर के मामलों ने गंभीर कानूनी रूप ले लिया है। Supreme Court of India से लेकर विभिन्न हाई कोर्ट्स तक न्यायपालिका ने स्पष्ट कर दिया है कि ट्रस्ट या चर्च की संपत्ति किसी व्यक्ति की निजी संपत्ति नहीं है और बिना वैधानिक अनुमति उसका कोई भी हस्तांतरण शून्य (Void) माना जाएगा। हालिया फैसलों ने तथाकथित “चर्च लैंड घोटालों” पर कड़ा संदेश दिया है कि धार्मिक आस्था की आड़ में संपत्तियों का दुरुपयोग बर्दाश्त नहीं होगा।
धार्मिक और धर्मार्थ संस्थाओं, विशेषकर चर्च संपत्तियों को लेकर उठ रहे विवादों ने अब गंभीर कानूनी रूप ले लिया है। अवैध कब्जे, फर्जी दस्तावेजों के जरिए बिक्री, ट्रस्ट संपत्तियों के दुरुपयोग और प्रशासनिक स्तर पर कथित अनियमितताओं के मामलों पर न्यायपालिका ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। भारत का सर्वोच्च न्यायालय तथा विभिन्न उच्च न्यायालयों ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी धार्मिक ट्रस्ट या चर्च की संपत्ति किसी व्यक्ति, पादरी, ट्रस्टी या समूह की निजी संपत्ति नहीं है, बल्कि वह एक विधिक इकाई (लीगल एंटिटी) के रूप में संरक्षित संपत्ति है, जिसका हस्तांतरण केवल विधि द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार ही संभव है।
इस संदर्भ में वर्ष 2005 का ऐतिहासिक निर्णय Church of North India v. Lavajibhai Ratanjibhai आज भी चर्च संपत्तियों से जुड़े मामलों में मार्गदर्शक मिसाल माना जाता है। यह निर्णय Supreme Court of India द्वारा 12 सितंबर 2005 को दिया गया था। न्यायमूर्ति एस.बी. सिन्हा और न्यायमूर्ति पी.के. बालासुब्रमण्यन की पीठ ने अपने विस्तृत फैसले में यह स्पष्ट किया कि केवल धार्मिक संप्रदायों के विलय (मर्जर) या प्रशासनिक पुनर्गठन के आधार पर संपत्तियों का स्वामित्व स्वतः नए संगठन में स्थानांतरित नहीं हो जाता।
क्या था पूरा मामला?
सन् 1970 में कई प्रोटेस्टेंट चर्चों के विलय से “चर्च ऑफ नॉर्थ इंडिया” (सीएनआई) का गठन हुआ। गुजरात क्षेत्र में कुछ सदस्यों ने इस विलय को स्वीकार नहीं किया और दावा किया कि वे पूर्ववर्ती “चर्च ऑफ इंग्लैंड इन इंडिया” के वैध उत्तराधिकारी हैं। विवाद इस प्रश्न पर केंद्रित था कि क्या विलय के बाद संबंधित चर्च संपत्तियों पर स्वामित्व स्वतः सीएनआई को प्राप्त हो गया।
सुप्रीम कोर्ट ने ट्रस्ट डीड, भारतीय ट्रस्ट अधिनियम, दीवानी कानून और संविधान के अनुच्छेद 26 के अंतर्गत धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार की व्याख्या करते हुए कहा कि धार्मिक निर्णय और दीवानी संपत्ति कानून दो अलग क्षेत्र हैं। धार्मिक विलय से संपत्ति का कानूनी स्वामित्व स्वतः नहीं बदलता। जब तक सक्षम वैधानिक प्राधिकारी—जैसे चैरिटी कमिश्नर—की अनुमति, विधिवत पंजीकरण और राजस्व अभिलेखों में संशोधन न हो, तब तक संपत्ति मूल ट्रस्ट या संस्था की ही मानी जाएगी।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि ट्रस्टी संपत्ति के “संरक्षक” होते हैं, “मालिक” नहीं। वे संपत्ति का संरक्षण और प्रबंधन कर सकते हैं, परंतु मनमाने तरीके से उसे बेचने या हस्तांतरित करने का अधिकार उन्हें प्राप्त नहीं है।
फर्जी दस्तावेजों पर सर्वोच्च न्यायालय की सख्ती
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में यह सिद्धांत स्थापित किया है कि धोखाधड़ी (फ्रॉड) से कोई वैधानिक अधिकार उत्पन्न नहीं होता। यदि किसी धार्मिक या ट्रस्ट संपत्ति को जाली दस्तावेजों, गलत दाखिल-खारिज या फर्जी रजिस्ट्रेशन के आधार पर बेचा गया है, तो वह लेन-देन शून्य माना जाएगा।
कानूनी सिद्धांत यह भी कहता है कि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर किया गया कब्जा कभी भी वैध स्वामित्व का आधार नहीं बन सकता। ऐसे मामलों में वर्षों बाद भी मुकदमा दायर कर कब्जा हटवाया जा सकता है। “एडवर्स पजेशन” का दावा भी तब मान्य नहीं होगा जब मूल दस्तावेज ही जाली पाए जाएं।
उच्च न्यायालयों की कड़ी टिप्पणी
दक्षिण भारत में Madras High Court ने चर्च ऑफ साउथ इंडिया (सीएसआई) की संपत्तियों से जुड़े मामलों में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि ट्रस्टी निजी लाभ के लिए संपत्ति बेचते हैं, तो यह आपराधिक विश्वासघात का मामला हो सकता है। अदालत ने कुछ मामलों में केंद्रीय जांच एजेंसी से जांच कराने तक के निर्देश दिए।
वहीं Allahabad High Court ने भी संस्थागत और मिशनरी संपत्तियों के पुराने रिकॉर्ड की जांच कर अवैध कब्जाधारकों को बेदखल करने के आदेश दिए हैं। अदालतों ने स्पष्ट कहा है कि धर्मार्थ उद्देश्य से आवंटित भूमि का निजी लाभ के लिए उपयोग कानून की भावना के विपरीत है।
उत्तर प्रदेश में सख्त अभियान
Uttar Pradesh Government द्वारा एंटी-भूमाफिया अभियान के तहत धार्मिक और संस्थागत संपत्तियों की पहचान, सत्यापन और जांच का कार्य तेज किया गया है। यदि पट्टे (लीज) की शर्तों का उल्लंघन कर जमीन बेची गई है, तो राजस्व संहिता की धाराओं के अंतर्गत उसे राज्य में निहित (वेस्ट) किया जा सकता है। शासन स्तर पर यह स्पष्ट किया गया है कि सार्वजनिक या ट्रस्ट भूमि पर अवैध कब्जा किसी भी स्थिति में स्वीकार नहीं किया जाएगा।
सहारनपुर में उठे गंभीर आरोप
राष्ट्रीय स्तर पर न्यायपालिका की इस सख्ती के बीच सहारनपुर जनपद में भी चर्च संपत्तियों को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। स्थानीय शिकायतकर्ताओं का कहना है कि कुछ लोगों ने कथित रूप से प्रशासन को गुमराह कर, महत्वपूर्ण तथ्यों को छुपाकर तथा फर्जी दस्तावेजों के माध्यम से चर्च की संपत्तियों को बेचने या हस्तांतरित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई। यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि राजस्व अभिलेखों में संदिग्ध प्रविष्टियां दर्ज कराने का प्रयास हुआ।
यदि इन आरोपों में सत्यता पाई जाती है, तो यह न केवल राजस्व नियमों का उल्लंघन होगा बल्कि आपराधिक धाराओं के अंतर्गत भी कार्रवाई योग्य अपराध बन सकता है। सुप्रीम कोर्ट के 2005 के ऐतिहासिक फैसले के आलोक में ऐसे सभी लेन-देन शून्य घोषित किए जा सकते हैं, यदि वे विधि सम्मत प्रक्रिया के बिना हुए हों।
कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि किसी चर्च या ट्रस्ट संपत्ति का हस्तांतरण चैरिटी कमिश्नर या सक्षम न्यायालय की अनुमति के बिना हुआ है, तो उसे चुनौती देकर निरस्त कराया जा सकता है। साथ ही भारतीय दंड संहिता की धारा 406 (आपराधिक विश्वासघात) और 420 (धोखाधड़ी) जैसी धाराएं भी लागू हो सकती हैं।
व्यापक कानूनी संदेश
सुप्रीम कोर्ट और उच्च न्यायालयों के निर्णयों से यह सिद्ध हो चुका है कि धार्मिक संस्थाओं की संपत्तियां केवल आस्था का विषय नहीं बल्कि विधिक संरक्षण का भी विषय हैं। “एक बार ट्रस्ट की संपत्ति, हमेशा ट्रस्ट की संपत्ति”—यह सिद्धांत अब न्यायिक रूप से स्थापित हो चुका है।
धार्मिक पुनर्गठन, प्रशासनिक बदलाव या आंतरिक प्रस्ताव से संपत्ति का स्वामित्व स्वतः नहीं बदल सकता। प्रत्येक हस्तांतरण को ट्रस्ट डीड, संबंधित अधिनियमों और सक्षम प्राधिकारी की अनुमति के अनुरूप होना अनिवार्य है।
प्रशासन की भूमिका और आगे की राह
यदि सहारनपुर या किसी अन्य जिले में चर्च संपत्तियों के संबंध में अनियमितता पाई जाती है, तो जिला प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह निष्पक्ष और पारदर्शी जांच कर वास्तविक स्थिति सार्वजनिक करे। यदि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर संपत्ति बेची गई है, तो उसे तत्काल निरस्त कर मूल संस्था के नाम बहाल किया जाना चाहिए।
देश की न्यायपालिका ने स्पष्ट संदेश दिया है कि धार्मिक पहचान के नाम पर कानून से ऊपर कोई नहीं है। ट्रस्ट संपत्ति का संरक्षण केवल धार्मिक कर्तव्य नहीं, बल्कि कानूनी दायित्व भी है।
अब यह समय है कि संबंधित प्रशासनिक अधिकारी, ट्रस्ट प्रबंधन और जागरूक नागरिक मिलकर यह सुनिश्चित करें कि धार्मिक एवं धर्मार्थ संपत्तियां अपने मूल उद्देश्य—सेवा, शिक्षा, सामाजिक उत्थान और आस्था—के लिए सुरक्षित रहें, न कि निजी लाभ का साधन बनें।
संपादक – वंदे भारत लाइव टीवी न्यूज़
ब्यूरो चीफ – Hulchal India News, सहारनपुर
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